शायरी एक नए अंदाज में
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” मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था,
वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था।
मैं उस को देखने को तरसती ही रह गई,
जिस शख़्स की हथेली पे मेरा नसीब था।
बस्ती के सारे लोग ही आतिश – परस्त थे,
घर जल रहा था और समुंदर क़रीब था।
दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की क़ब्र में,
मैं जिस को चाहती थी वो लड़का ग़रीब था। “